राजस्थानी भाषा व साहित्य का मूल इतिहास
राजस्थानी साहित्य लगभग विक्रम संवत् की बारहवीं शताब्दी से गद्य-पद्य दोनों में लगातार लिखा जाता रहा है। यह विविध रूपात्मक भी है और विषय वैविध्य की दृष्टि से काफी समृद्ध भी है। ऐसे साहित्य की लाखों हस्तलिखित पोथियां विविध ग्रंथ भंडारों एवं व्यक्तिगत संग्रहों में सुरक्षित हैं, जो सम्पादन एवं प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। यह समग्र राजस्थानी साहित्य सामान्य साहित्य नहीं है। इस राजस्थानी साहित्य की नींव पर ही हिन्दी साहित्य के इतिहास के आदिकाल का भव्य महल निर्मित हुआ है। अगर हिन्दी साहित्य के आदिकाल के इतिहास से राजस्थानी साहित्य को ही हटा दें तो हिन्दी साहित्य की प्राचीनता ही समाप्त हो जायेगी। Rajasthani BhashaSahitya Mool Itihas
साथ ही राजस्थानी का जैन साहित्य बोल-चाल की राजस्थानी में बड़ी मात्रा में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त राजस्थानी का चारण साहित्य, भक्ति साहित्य और लोक साहित्य भी विविध विधाओं में बहुत विस्तृत है। ऐसे महान्, विशाल, समृद्ध एवं विस्तृत समग्र राजस्थानी साहित्य को आधार बनाकर कोई एक बड़ा इतिहास ग्रंथ नहीं लिखा गया है। फुटकर प्रयास अलग-अलग विषयों एवं काल को आधार बनाकर अवश्य हुए लेकिन सम्पूर्ण राजस्थानी साहित्य को आधार बनाकर 12वीं से लेकर 19वीं शताब्दी तक कोई एक इतिहास ग्रंथ नहीं लिखा गया, लम्बे समय से इसकी प्रबल मांग रही है। ऐसे महत्वपूर्ण, समग्र, समृद्ध एवं विस्तृत राजस्थानी साहित्य को आधार बनाकर इस श्रमसाध्य कार्य को करने का बीड़ा विद्वान डॉ. हुकमसिंहजी भाटी ने उठाया है।
Rajasthani BhashaSahitya Mool Itihas
यह पुस्तक न केवल राजस्थानी भाषा के प्रेमियों, शोधकर्ताओं (Ph.D. Scholars) और शिक्षकों के लिए एक अमूल्य धरोहर है, बल्कि UGC NET, RPSC, RAS, REET, SI, पटवार, और राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSMSSB) की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए एक अचूक अस्त्र है।
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