राजस्थानी लोक-संस्कृति एवं कायमखानी समाज
किसी भी देश की संस्कृति एवं सभ्यता उसकी पहचान स्वतः करा देती है। हमारे समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों पर सांस्कृतिक परम्पराओं की छाप स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। ‘लोक’ सम्पूर्ण सृष्टि, चराचर और यहाँ तक कि परब्रह्म का परिचायक है। इस ‘लोक’ को समझना ही हमारी मेधा का ध्येय है। ‘लोक’ की शाश्वत अभिव्यक्ति लोक-परम्पराओं व लोक-साहित्य के माध्यम से लोक-संस्कृति के रूप में उभर कर आती है। इस लोक-संस्कृति के साथ ‘राजस्थानी’ शब्द जुड़ते ही इस प्रदेश के विभिन्न अंचलों में पोषित व पल्लवित उस संस्कृति का उद्बोधन करता है जो यहाँ की कला, लोक- गाथा, लोक-वार्ता, लोक-गीत तथा लोक-परम्पराओं से सम्बंधित है। Lok Sanskriti Kayamkhani Samaj
‘राजस्थानी लोक-संस्कृति’ के साथ ‘कायमखानी समाज’ के जुड़ने से स्वतः ही इस समाज की सांस्कृतिक परम्पराओं की विशिष्ट पहचान व निरन्तरता दृष्टिगोचर होने लगती है। किसी भी समाज की पहचान उसकी ‘लोक-संस्कृति’ ही कराती है, जिसका अध्ययन वर्तमान युग की पीढ़ी की आवश्यकता है।
प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया गया सारस्वत प्रयास है। Lok Sanskriti Kayamkhani Samaj
Rajasthani Folk Culture and Kayamkhani Society
– प्रो. मदनराज डी. मेहता
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