जोधपुर दुर्ग महरानगढ़
महरानगढ़! मारवाड़ का मुकुटमणि। राजस्थान का गौरव! गढ़ की प्राण-प्रतिष्ठा 1459 ई. में राठौड़ों के दुर्धर्ष योद्धा राव जोधा ने की। नाथ योगी की चिड़िया ट्रंक पहाड़ी पर; चिड़ियानाथ जी की नाराजगी हुई, फिर आशीर्वाद भी मिला। 565 साल बीत गये। यह पुस्तक इस किले के विकास का, बनाने-सुधारने का, इसकी रक्षा के लिये बलिदान देने वाले स्वामिभक्तों का, नींव से कंगूरों तक इसे बनाने वालों का इतिहास ही नहीं, उनकी स्मृतियों को ताजा करने का प्रयत्न है। मारवाड़ के राठौड़ शासकों की 1459 ई. से वर्तमान समय तक महरानगढ़ के निर्माण-नवनिर्माण में रही अहम् भूमिका के साथ प्रारम्भ कर लेखक ने महलों, मंदिरों, पोलो, बुर्ज, चहारदीवारी और जूंझारों की छतरियों और देवलियाँ-पूजा स्थानों की चर्चा की है। Jodhpur Durg Mehrangarh
इनमें से हरेक को बनाने वाले गजधरों उनके सहायक, काम की निगरानी रखने वाले कामदारों का मेहनताना, समयावधि, पत्थर और लकड़ी कहाँ से आयी, प्लास्टर करने वाले, रंग देने वाले, चित्रांकन व कांच का काम करने वाले, इनका काफी रोचक विवरण क्षण-क्षण आपकी रुचि बढ़ाता रहेगा। कुल मिलाकर मूल अभिलेखों पर आधारित किसी किले की नित्य-विकास प्रक्रिया, उससे जुड़े लोगों और उसमें जूंझार हुए वीरों पर इस तरह की कोई पुस्तक देखने में नहीं आयी। इसे पढ़कर कोई शोधार्थी ऐसे अध्ययन में प्रवृत्त होगा तो वह लेखक की इस पुस्तक को-जिसे ढाई लाख अभिलेखों के अध्ययन के बाद तैयार किया – सार्थक करेगा। Jodhpur Durg Mehrangarh
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