Parivartan Ki Pakad

परिवर्तन की पकड़
Author : P. Shivakami
Translator : Munnalal Dakot
Language : Hindi
Edition : 2026
Pages : 113
Cover : Paperback/Softcover
ISBN : 9789349495319
Publisher : Beyond Books

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹249.00.

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परिवर्तन की पकड़

‘परिवर्तन की पकड़’ मशहूर तमिल लेखिका और सामाजिक चिंतक डॉ. पी. शिवकामी के पहले पूर्ण उपन्यास ‘पज़ैयाना कज़िथलुम’ (Pazhaiyana Kazhithalum) का हिंदी अनुवाद है। 1980 के दशक में प्रकाशित इस रचना को तमिल भाषा के शुरुआती और अत्यंत महत्वपूर्ण दलित उपन्यासों में गिना जाता है। इसने उन सवालों को, जिन पर तमिल साहित्य में अब तक अक्सर दबे-छुपे या अप्रत्यक्ष ढंग से बात होती थी, जाति, सत्ता और सामाजिक न्याय पर खुली बहस का हिस्सा बना दिया। इस अर्थ में यह उपन्यास जाति-विरोधी संघर्ष और आगे चलकर दलित आत्मकथा-लेखन की सशक्त परंपरा के लिए भी एक महत्वपूर्ण प्रेरणा बना। Parivartan Ki Pakad

Parivartan Ki Pakad | Pazhaiyana Kazhithalum

ग्रामीण तमिलनाडु की पृष्ठभूमि में रचा गया यह उपन्यास हाशिए के समुदाय के करिश्माई नेता कथामुथु की कहानी के माध्यम से जाति-व्यवस्था, सामाजिक अन्याय, सत्ता-संबंधों और सम्मान व पहचान के संघर्ष को सामने लाता है। परंपरा और बदलाव के बीच संतुलन साधते हुए कथामुथु का जीवन उस समय निर्णायक मोड़ लेता है, जब वह अत्याचार का सामना कर रही अपने ही समुदाय की महिला थंगम की मदद के लिए आगे आता है। इसके बाद निजी जीवन, सामुदायिक संघर्ष और राजनीति के बीच टकराव लगातार गहराता जाता है।

आम लोगों की जीवंत भाषा में लिखा गया यह उपन्यास दलित समुदाय के रोज़मर्रा के संघर्षों के साथ-साथ उसके भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को भी बेबाकी से सामने रखता है। कथामुथु धीरे-धीरे उम्मीद और प्रतिरोध का प्रतीक बनता है, लेकिन उसके सामने गहरी जड़ें जमा चुकी रूढ़िवादी सोच, जातिगत सत्ता और राजनीतिक चालों की ऐसी दीवार खड़ी होती है, जिसे पार करना आसान नहीं। कहानी आगे बढ़ते हुए यह सवाल उठाती है कि सामाजिक परिवर्तन की राह में नेतृत्व, परंपरा और मुक्ति की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं।

उपन्यास का मार्मिक अंत पाठक को नियति, न्याय और मुक्ति से जुड़े कई सवालों के साथ छोड़ जाता है। लगभग एक दशक बाद लिखी गई ‘ऑथर्स नोट्स’ (लेखक की टिप्पणी) में शिवकामी स्वयं इस रचना, उसके पात्रों और उसके विचारों की ओर लौटती हैं और एक अधिक परिपक्व तथा आत्मालोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करती हैं।

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