हिन्दी के प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के असामान्य पात्र : साहित्य और मनोविज्ञान का संबंध पथ्वी के नीचे बहती जलधारा के समान है। मनुष्य जीवन मनोविज्ञान की न केवल एक प्रयोगशाला है अपितु अनवरत मनोविज्ञान के विकासगामी सिद्धातों की उत्स-स्थली है। इस जीवन रंगमंच के प्रत्येक पात्र में मनोविज्ञान की अनेकानेक सतहें पात्रों सहित पूरे रंगमंच को जिज्ञासा का विषय बना देती है।
फिर भी यह सत्य है कि ‘मनोविज्ञान-उपन्यास’ एक मिथक है। इस मिथक का आधार निश्चित रूप से फ्रायड का मनोवैज्ञानिक चिंतन है। फ्रायड ने पहली बार ‘चेतन-जगत्’ शब्द-युग्म को प्राकृतिक-जगत् से अलग किया। अचेतन और अवचेतन जगत् की प्रतिष्ठा करते हुए कहा कि मानवीय अस्तित्व की सारी सहजता, स्वाभाविकता का वास्तविक-स्वरूप उसके अवचेतन में अभिव्यक्त होता है। उन्होंने यह सत्य भी स्थापित किया कि मानव जगत् के सारे क्रिया-कलापों, मानवीय-रिश्तों, मानवीय-व्यवहारों के मूल में काम-चेतना’ ही होती है। फ्रायड ने नर-नारी के संबंधों को इन्हीं आधारों पर विश्लेषित किया। सभ्य समाज ने नर-नारी के बीच काम-भावना के स्वाभाविक संबंध से इतर संबंध निर्मित किये। इन्हीं इतर संबंधों को ढोने वाले समाज के लोग ही इस समाज के असामान्य-पात्र हैं। मनोवैज्ञानिक-उपन्यास के केन्द्र में ऐसे ही असामान्य-पात्र होते हैं। पाचवें दशक से ऐसे मनोवैज्ञानिक-उपन्यासों का प्रारंभ हुआ। रचना-शिल्य के स्तर पर भी ऐसे उपन्यास एक अलग संयोजन का निर्माण करते हैं। प्रस्तुत पुस्तक मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर मनोवैज्ञानिक-उपन्यासों के विश्लेषण का एक विनम्र प्रयास है।




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