सुधा अरोड़ा के कथासाहित्य में जीवनयथार्थ
सुधा अरोड़ा के सामाजिक सरोकार बहुत गहरे हैं। जीवन के विविध क्षेत्रों में वे अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। सामाजिक क्षेत्रों में सार्थक हस्तक्षेप और जनसामान्य से प्रभावी संवाद कायम करना उनके लिए साहित्य – सर्जना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। दृश्य-श्रव्य कार्यशाला में सहभागी महिला कलाकारों के आत्मकथ्यों पर आधारित श्रृंखला का सम्पादन उनकी रचनाधर्मिता के साथ-साथ उनके संप्रेषण – कौशल का प्रमाण है। न जाने कितनी रचनात्मक प्रवृत्तियों का वे आधार केन्द्र बनी हैं। जीवन को रचनात्मक बनाने के लिए सुधा अरोड़ा ने अपनी चेतना को स्वार्थ से ऊपर उठा कर परार्थकेन्द्रित किया है। Sudha Arora KathaSahitya JeevanYatharh
उन्होंने निष्ठापूर्वक मानवीय मूल्यों को जीने का प्रयास किया है। मूल्यहीनता से सदैव उनकी ठनी रही। संकल्प के प्रति वे दृढ़ रही हैं। ‘स्व’ में ‘स्थित’ रहने की सुधा अरोड़ा ने निरन्तर साधना की है। मानवीय करुणा, आस्था व सर्जन के निमित्त उनकी अभिव्यक्ति वायवीय नहीं है, अपितु उनका दर्द सार्वजनिक है। उनके विचार उनकी रचनाओं में खुल कर व्यक्त हुए हैं; यद्यपि संघर्ष तथा विद्रोह के स्वर भी उनकी कहानियों में सशक्त बन निरन्तर उभरे हैं। Sudha Arora KathaSahitya JeevanYatharh
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