Pareek Vansh Bhaskar

पारीक वंश भास्कर
Author : Giriraj Vyas
Language : Hindi
Edition : 2025
ISBN : 9789372451368
Publisher : Rajasthani Granthagar

Original price was: ₹700.00.Current price is: ₹559.00.

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पारीक वंश भास्कर

जो समाज अपने इतिहास को सुरक्षित नहीं रखता, अपने महापुरुषों के आदर्शों को रेखांकित नहीं करता, उस समाज का गौरवपूर्ण इतिहास विस्मृत हो जाता है और नई पीढ़ी अपने ही समाज के श्रेष्ठ आदर्शों से विमुख होकर पथ- भ्रष्ट समाज का निर्माण करती है। Pareek Vansh Bhaskar

अतः हर पीढ़ी की यह जिम्मेदारी है कि अपने इतिहास को सुरक्षित करे और अपने महापुरुषों के आदर्शों को प्रकाशित कर श्रेष्ठ, समृद्ध व सशक्त समाज के निर्माण में अपने कर्तव्य का निर्वहन करे।

मनुष्य देव, ऋषि तथा पितृ तीन ऋणों का ऋणी माना जाता है। देवऋण धर्म कार्यों से। ऋषिऋण ज्ञान से। पितृऋण संतान से चुकाया जाता है। यहाँ जो ऋषिऋण है, वह जिस ज्ञान से चुकाया जाता है, उस ज्ञान का अर्थ ‘स्वाध्याय प्रवचने’ – अर्थात् श्रमपूर्वक ज्ञान प्राप्त करना तथा उस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। हमारे यज्ञोपवित का एक सूत इसी ऋण की याद दिलाता है । यह इसलिए तय किया गया कि किसी समाज और राष्ट्र के संस्कारित होकर सर्वोच्च शिखरों के आरोहण के लिए अपने पूर्वजों की ज्ञान – परम्परा से सम्पन्न होना परम आवश्यक होता है। भारत इसीलिए विश्वगुरु रहा, क्योंकि हर परिस्थिति में हम अपनी जड़ों से सदैव जुड़े रहे।

अपने हजारों-लाखों वर्षों के इतिहास से जुड़े रहकर हमने अपनी संस्कृति को हर विपदा में भी संकल्प के साथ प्राणित रखा है। हम किसी अनुष्ठान में जब संकल्पित होते हैं तब अपने सम्पूर्ण अतीत से वर्तमान तक जुड़ते हुए इस प्रकार कहते हैं- ” मैं ….. पुत्र…. पौत्र… प्रपौत्र…. अमुक युग में अमुक दिन, ब्रह्माण्ड के अमुक द्वीप के, अमुक देश के, अमुक प्रदेश के, अमुक नगर में, अमुक मास, वार, तिथि को यह संकल्प करता हूँ।” Pareek Vansh Bhaskar

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