राठौड़ां री ख्यात भाग-1, 2, 3 | Rathoran Ri Khyat Part-1, 2, 3

Language: Hindi

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हुकम सिंह भाटी | Hukam Singh Bhati

राजस्थान के इतिहास-लेखन में ख्यात ग्रंथों का विशेष महत्त्व रहा है। विशेषता मारवाड़ में ख्यात-लेखन की सुदृढ़ परम्परा रही है। यहीं के राठौड़ शासकों द्वारा प्रोत्साहन मिलने पर जहाँ अनेक ऐतिहासिक प्रबंध काव्यों का सृजन हुआ, वहीं ऐतिहासिक घटनाओं को संजोने के लिए ख्यात ग्रंथों की रचना की गई। अद्यावधि प्रकाश में आये ख्यात ग्रंथों में आईदान खिड़िया विरचित यह ‘राठौड़ां री ख्यात’ सबसे वृहदाकार होने के साथ इतिहास के अनेक अल्पज्ञात व अज्ञात पहलुओं को अपने कलेवर में समेटे हुए है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सृजित यह ख्यात अप्रकाशित होने से इसका उपयोग अभी तक पूर्ण रूप से नहीं हो सका।
ख्यात में मारवाड़ के संस्थापक राव सीहा से महाराजा मानसिंह (1243ई. से 1843ई.) तक के राठौड़ शासकों के जन्म, राज्यारोहण, सैनिक अभियानों और मुख्य उपलब्धियों के अलावा उनकी संतति का सटीक विवरण मिलता है, जिससे राठौड़ों की प्रख्यात शाखाओं का अंकुरण हुआ और इतिहास में भी उनकी महत्ती भूमिका रही है। युद्ध अभियानों में प्राणोत्सर्ग करने वाले राठौड़ योद्धाओं के अलावा भाटी, चौहान, प्रतिहार, सीसोदिया आदि जातियों के योगदान का जहाँ पता चलता है, वहीं ओसवाल, पांचोली, ब्राह्मण आदि जाति के अनेक ऐतिहासिक पुरुषों के बारे में भी नवीन पक्ष उद्घाटित हुए है। ख्यात में उल्लिखित घटनाओं से मारवाड़ के शासकों का मुगल, मराठा और ब्रिटिश आदि केन्द्र सत्ता के साथ सम्बंधों का बोध होता है और इनकी मनोवृति भी उजागर होती है। इतना ही नहीं; मेवाड, जैसलमेर, बीकानेर, जयपुर, कोटा, बूंदी आदि राज्यों के साथ सम्बंधों के बारे में अनेक सूत्र इस ख्यात में मिलते है।

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